कहानी और “और एक कहानी”

     Written by Dilip Sharma

सिरोही जिले के आबू रोड ब्लॉक में अर्ली लिटरेसी प्रोजेक्ट के तहत 10 राजकीय विद्यालयों की प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के साथ लाइब्रेरी कार्य करने के दौरान टैबलेट आधारित ई-पुस्तकों के संकलन (ई-रीडर) का अनुप्रयोग हुआ l इस प्रोजेक्ट, जिसको “और एक कहानी” नाम दिया गया, के साथ काम करने के दौरान बच्चों ने जो प्रतिक्रियाएं दी, उससे कई सवाल मेरे मन में घर कर गए l टैबलेट जैसे उपकरण पर बच्चों ने पहली बार जब अपनी नन्ही उंगलिंयां फिराते हुए अपनी दुनिया के बारे में खोजना शुरू किया तो उनके चेहरे पर उत्सुकता एवं आनंद के भाव बिखरे देख बहुत अच्छा लगा l बोलती किताबों और पात्रो की गतिशील रंगीनीयत ने बच्चों को अपनी ओर तुरंत व सहज ही आकर्षित कर लिया और सबसे पहला सवाल मन में खड़ा हुआ – क्या किताबें पहली बार में ऐसा कर पाती ?

टैबलेट पर कुछ महीने अंगुलियां फिराते-फिराते बच्चों ने कहानियों की ई-किताबों से दोस्ती कर ली हो ऐसा लगने लगा, पर सब कुछ खोज लेने की बाल मन की चाहत और इसके लिए उनकी लम्बी छलांगों को सहज प्रवृत्ति मान कर अपने जैसी दुनिया की खोज करते देख दूसरा सवाल आया की ये दोस्ती टैबलेट से है या किताबों से ?

कुछ समय और बीत जाने पर टैबलेट में कहानियों और खेल-खेल में टेक्स्ट पढ़ना सीखने के अनुप्रयोगों से बच्चों का लगाव बढ़ता ही चला जा रहा है, और उनको जब तक रोका न जाये तब तक टैबलेट पर कुछ न कुछ करते रहने से एक और सवाल उठा की बच्चों के लिए अपनी इच्छा से कहानियां पढ़ने और आनंद देने वाले खेल खेलने के बीच हमारी किताबें कहा है ? और इनकी बच्चों को कितनी ज़रुरत है ? और ज़रुरत है भी या नही ?

मेरे लिए इन सवालों के जवाब ढूंढना भी बहुत रोचक रहा और ये जवाब ढूंढ़ने के लिए लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स (LEC) ने काफी मदद की l सबसे पहले यह जानना कि ये बच्चे जिस परिवेश से आते है उनमे किताबों के अलावा मोबाइल, टैबलेट और टीवी जैसे दृश्य-श्रव्य साधनों की कितनी जगह है ? तो पता चला की लगभग सभी बच्चों ने मोबाइल अपने गाँव एवं घर में अपने बड़ों के पास देखे हैं जिसमे वो बात करने के आलावा गाने, विडियो और फोटो देखकर आनंदित होते हैं लेकिन कुछ ही बच्चों ने कभी मोबाइल हाथ में लेकर चलाया था l और अधिकतर बच्चों के घर में टीवी नहीं है लेकिन वो टीवी के बारे में जानते हैं l अगर किताबों की बात करे तो इक्का दुक्का बच्चों के घर में ही कहानियों एवं कविताओं की किताबें उपलब्ध थी l कुछ विद्यालयों में बच्चों का पाठ्य पुस्तकों के इतर भी लाइब्रेरी की पुस्तकों एवं बाल साहित्य का अच्छा खासा संग्रह उपलब्ध था परन्तु बच्चों की उनसे सहज संवाद की स्थिति नहीं देखी गई l

एक और बात जो भाषा के सन्दर्भ में पता चली कि बच्चों के घरों में पूर्णतया स्थानीय भाषा (गरासिया एवं मारवाड़ी) ही बोली जाती थी जो शायद उनके माता पिता की औपचारिक हिंदी की शिक्षा के आभाव के कारण था l हिंदी से इन बच्चों का वास्ता केवल शिक्षकों द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों एवं कक्षाओं में पढ़ाने के दौरान ही पड़ता था और अधिकतर बच्चे हिंदी में पढ़ने के लिए वर्णों, शब्दों एवं वाक्यांशों के साथ जूझते हुए किताबों में लिखा पढ़ने में असहज ही महसूस कर रहे थे l तो इस पूरे सन्दर्भ में बच्चों की शुरूआती दोस्ती टैबलेट से थी और कही न कही टैबलेट में भी एनीमेटेड विडियो युक्त कहानियों से और उन में भाषा सम्बन्धी रोचक खेल अनुप्रयोगों से भी क्योंकि वो उन्हें देखने सुनने एवं समझने के बाद आनंद दे रही थी l लेकिन चित्रकहानियों एवं अधिक टेक्स्ट वाली कहानियों की ई-पुस्तकों में बच्चों की रूचि ज़्यादा नहीं थी l ई-लाइब्रेरी के दौरान पढ़ने में रूचि पैदा करने वाली गतिविधियों जैसे रीड अलाउड, सह पठन एवं बुक टॉक ने कुछ बच्चों में चित्र कहानियों को पढ़ने के लिए जरुर थोड़ी रूचि जगाई थी l लेकिन फिर भी बच्चों ने प्रिंट किताबों से दोस्ती नहीं की थी l

LEC के दौरान फील्ड कार्य शोध हेतु जब दो विद्यालयों में प्रिंटेड किताबों के साथ जब इसी तरह की गतिविधियां नियमित की जाने लगीं तो बच्चों ने तुरंत ही किताबों को भी टैबलेट कि तरह अपना दोस्त बनाना शुरू कर दिया l यह देखकर अचम्भा ही था की दोनों साधनों में उनके आकर्षण का केंद्र कहानियां ही थी l एक फर्क जो नज़र आया वो यह था की बच्चे ई-पुस्तकों के बजाय पुस्तकों को ज़्यादा गंभीरता से ले रहे थे l जैसे कहानी को पूरा देखना या पढ़ना, ई-पुस्तकों के बजाय पुस्तकों के चित्रों पर ज़्यादा गौर करना l और गौर करने वाली बात यह भी थी कि 120 ई-पुस्तकों के संग्रह में बच्चों को 40 के लगभग ई- पुस्तकें ही पढ़ने में ज़्यादा अच्छी लगीं l बस सभी एनिमेटेड विडियो वाली कहानियां बच्चों ने खूब पसंद की l तो मेरे पहले और दूसरे सवाल का जवाब मेरे सामने था की बच्चों के लिए टैबलेट एवं “और एक कहानी” शुरुआत में आकर्षण का केंद्र थी और इसकी मुख्य वजह थी एनिमेटेड विडियो युक्त कहानियां, परन्तु बच्चों के सामान्य पुस्तकों से एक बार जुड़ने के बाद पुस्तकों ने भी वही काम किया जो ई-पुस्तकों ने किया था l एक बार बच्चों का जुडाव कहानियों से होने के बाद बच्चों ने दोनों तरह की पुस्तकों को पढने में तरहीज दी l एक बात और निकल कर सामने आई कि खेल खेल में हिंदी भाषा सीखने के लिए टैबलेट में भाषा-अनुप्रयोगों को भी बच्चों ने खूब पसंद किया l

जब कुछ समय बीत जाने पर बच्चों के लिए टैबलेट (और एक कहानी) और कहानियों की किताबें सहज उपलब्ध होने  लगीं तो अचानक ही यह देखना बहुत ही रोचक रहा कि कुछ बच्चों ने अपनी पसंद की कहानी पढने के लिए टैबलेट की जगह सामान्य पुस्तक को चुना l पर इस तथ्य की पुष्टि के लिए मुझे लगता है कि बच्चों के साथ “और एक कहानी” और पुस्तकों के साथ लाइब्रेरी के समग्र आयामों को ध्यान में रखते हुए कुछ और समय बिताना आवश्यक है l

पर अब तक के “और एक कहानी” एवं पुस्तकों के सफ़र में यह बात तो साफ़ साफ़ पता चल चुकी है कि बच्चों के लिए टैबलेट और एनिमेटेड पुस्तकों से जुड़ना बहुत आसान था पर दूसरे प्रकार की ई-पुस्तकों के साथ यही बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती जब तक बच्चों के साथ लाइब्रेरी आधारित द्रश्य-श्रव्य-पठन गतिविधियां नहीं की जाएँ l वही कुछ समयोपरांत बच्चों को कहानियों से जुड़ने के लिए प्रिंट किताबों ने भी वही काम किया जो कि टैबलेट और “और एक कहानी” ने किया था l और कहीं कहीं यह संकेत भी मिले कि कहानियों की किताबों के साथ बच्चों का जुड़ाव ई-पुस्तकों में कहानियों को पढ़ने की तुलना में ज़्यादा गहरा था जहाँ बच्चों ने चित्रों को देख कर कहानी समझने, कहानी के भावो को आत्मसात करने एवं अपनी प्रतिक्रियाये देने में ज़्यादा संवेदना दिखाई l पर यह दावे के साथ कहना शायद थोड़ा जल्दबाज़ी भरा निर्णय होगा l इसके लिए कुछ और समय  ई-पुस्तकों एव प्रिंट पुस्तकों को एक ही कसौटी पर कसना होगा व यह देखना होगा कि एसा किस वजह से हो रहा है l

मेरे मन की शंका – क्या डिजिटल तकनीक एवं ई-पुस्तकों की वजह से प्रिंट पुस्तकों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जायेगा? –  इसका एक अपुष्ट जवाब तो मुझे मिल ही गया की शायद नही, निकट भविष्य में तो बिलकुल नहीं क्योंकि सबके लिए जहाँ डिजिटल तकनीक एवं ई-पुस्तकों की सहज उपलब्धता अभी भी दूर की कौड़ी है, वही दीर्घ काल से चली आ रही पुस्तक संस्कृति ही बच्चों में उन मानवीय संवेदनाओ का विकास कर सकती है जो कि आभासी न होकर वास्तविक है l

एक पुस्तक अपने अस्तित्व का अहसास दे सकती है पर एक ई-पुस्तक शायद नहीं l

 

Dilip Sharma works with Center for micro Finance (CMF) as Block Anchor (Education), based out of Sirohi, Rajasthan and is a participant in the Library Educators’ Course (Hindi batch), 2017.

Source: Issue 4, Torchlight Journal published by Bookworm, Goa http://journal.bookwormgoa.in/

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शहर में सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ टाटा ट्रस्ट्स द्वारा संचालित पुस्तकालय शिक्षकों एक अद्वितीय कोर्स

भोपाल,नवंबर 24, 2017. टाटा ट्रस्ट्स की पहल ‘पराग’ द्वारा आज शहर में पुस्तकालय क्षेत्र में कार्यरत प्रैक्टिशनर्स के व्यावसायिक विकास लिए चलाये जा रहे अनूठे लायब्रेरी एजुकेटर्स कोर्स (एलइसी) के सफल समापन की घोषणा की गई. इस कोर्स में आठ राज्यों से प्रतिभागियों ने नामांकन करवाया था जिनमें मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, दिल्ली तथा गुजरात शामिल हैं.

एक प्रोफेशनल डेवलपमेंट कोर्स के तौर पर एलईसी को ‘टाटा ट्रस्ट्स’ द्वारा विकसित किया गया है और भोपाल में इसे ‘हिंदी’ भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है. लाइब्रेरियंस, शिक्षकों तथा अन्य पेशेवरों के लिए डिजाइन की गई यह पहल बच्चों के लिए एक उन्मुक्त और रचनात्मक लायब्रेरी की स्थापना और संचालन के मुद्दे को केंद्र में रखती है. एलईसी को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह पेशेवरों को ऐसी लायब्रेरी की कल्पना करने को प्रेरित करती है जो सभी बच्चों के लिए एक उन्मुक्त तथा रचनात्मक स्थान के तौर पर साकार हो सके. इसके तीसरे संस्करण में इस कोर्स में ऐसे 30 प्रतिभागियों का नामांकन किया गया जो विभिन्न एनजीओ के जरिये ग्रामीण जनजातीय या शहरी गरीब क्षेत्रों/निचली बस्तियों में कार्यरत हैं और लायब्रेरी के साधनों के साथ बच्चों तथा स्कूल लायब्रेरियंस में पढ़ने की रूचि को बढ़ावा देकर स्कूली शिक्षा के स्तर को और सुधार के लिए काम कर रहे हैं. 

ड्युअल मोड में आयोजित इस कोर्स में कॉन्टैक्ट सेशंस (सम्पर्क सत्र) तथा दूरस्थ शिक्षा शामिल है. 7 माह की अवधि का यह कोर्स प्रतिभागियों को निम्न बिंदुओं में सक्षम बनाता है-

* शिक्षा के क्षेत्र में लायब्रेरी/पुस्तकालय की महत्वपूर्ण भूमिका को समझना और बच्चों का पुस्तकों के साथ जीवनभर का रिश्ता कायम करना

* अपने शैक्षणिक प्रयासों में निहित लायब्रेरी कार्यों के लिए एक व्यावसायिक दृष्टी का विकास और संवाद करना

* बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले साहित्य की पहचान करना और उससे जुड़ना

* यूजर्स/उपयोगकर्ताओं से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देने के साथ स्कूलों और प्रोग्राम साइट्स के लिए लायब्रेरी कलेक्शन की संभाल करना

* किताबों से जुड़ी सार्थक गतिविधियों के संचालन द्वारा बच्चों के लिए साहित्य को जीवंत करना

* बच्चों के विशिष्ट संदर्भों और अलग अलग रुचियों के हिसाब से प्रतिक्रिया देना

* स्कूलों तथा सामुदायिक स्थलों पर बच्चों के लिए जीवंत पुस्तकालयों की स्थापना और संचालन करना

* कार्यान्वयन योजनाओं का विकास करना तथा लायब्रेरी क्षेत्र में कार्यरत स्टाफ को ऑन-साईट सहायता की पेशकश करना

* निरंतर पुस्तकालय के उपयोग को सुनिश्चित करने हेतु माता-पिता तथा विभिन्न समुदायों की मदद से रणनीति बनाना

* लायब्रेरी के काम के संदर्भ में जानकार और प्रभावी प्रोग्राम मॉनिटरिंग सिस्टम डिजाइन करना

* देशभर में लायब्रेरी एजुकेटर्स के समुदाय के साथ नेटवर्क स्थापित करना

इस संबंध में जानकारी देते हुए, सुश्री अमृता पटवर्धन, हेड एजुकेशन एन्ड स्पोर्ट्स,टाटा ट्रस्ट्स, ने कहा-‘टाटा ट्रस्ट्स की पहल ‘पराग’, बच्चों के बीच पढ़ने को बढ़ावा देने के विचार पर केंद्रित है. लायब्रेरी एक ऐसा स्थान है जहाँ बच्चे किताबों के अच्छे संग्रह के साथ जुड़ते हैं. जीवंत पुस्तकालयों को पेशेवर प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होती है जो अच्छे किताबों के संग्रह के साथ बच्चों को जोड़ने की महत्ता को समझ सकें और जिनमें ऐसा कौशल व दृष्टि हो जो विभिन्न रुचियों वाले शिक्षार्थियों के लिए लायब्रेरी को सक्रिय बना सकें। इस कोर्स के जरिये, हमारा लक्ष्य इस क्षेत्र में आये अंतर को दूर करना है और इस सिलसिले में इस बैच के हिस्से के तौर पर 29 कुशल और प्रशिक्षित शिक्षकों के कैडर का निर्माण करने पर हमें गर्व है.’

इससे आगे जानकारी देते हुए, सुश्री अजा शर्मा, फैकल्टी तथा लीड- लायब्रेरियंस एन्ड कैपेसिटी बिल्डिंग, पराग इनिशिएटिव, टाटा ट्रस्ट्स ने बताया-‘भोपाल को इसकी समृद्ध संस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है और यह भारत में कलाकारों के केंद्र के रूप में भी ख्यातिप्राप्त है. यही कारण है कि हमने एक वर्ष पूर्व हमने भोपाल में इस कोर्स को आरम्भ किया। एक बच्चे को सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों से समृद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि लायब्रेरी एजुकेटर्स तथा शिक्षक संदर्भों का निर्माण करें और पढ़ने तथा किताबों के बीच में एक रचनात्मक संबंध बनायें। हमें आशा है कि इस कोर्स के जरिये हम उच्च गुणवत्ता वाले लायब्रेरी एजुकेटर्स के एक कैडर को प्रस्तुत करने में सक्षम होंगें, ऐसे एजुकेटर्स जो कम उम्र में ही बच्चों के समग्र विकास में योगदान देंगे तथा इन सकारात्मक लायब्रेरी से जुड़े अनुभवों को उन बच्चों के लिए उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे।’

पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के बड़े प्रतिशत के लिए, स्कूल लाइब्रेरीज बच्चों के साहित्य तक पहुँच बनाने का सर्वोत्तम स्रोत होती हैं. हालाँकि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब भी करीब 74 प्रतिशत स्कूलों में फंक्शनल लाइब्रेरीज नहीं हैं (वैल्यूनोट्स, 2013 के अनुसार). शिक्षा से जुड़े शोध भी बच्चों के पाठ्यपुस्तकों तथा कोर्स संबंधी मटेरियल के अलावा अन्य अच्छी पुस्तकों तथा रीडिंग मटेरियल से जुड़ने के महत्व पर जोर देते हैं, ताकि उनकी पढ़ने के दायरे में विविधता आये और उनकी कल्पना में विस्तार हो. 

पराग, के बारे में:

पराग, टाटा ट्रस्ट्स का फ्लैगशिप कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों की उपलब्धतता तथा उन तक उन तक पहुँच बनाने में सहायता कर साहित्य को हर बच्चे के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना है. यह पहल भारतीय भाषाओं में बच्चों की पुस्तकों तथा साहित्य के विकास एवं प्रसार का समर्थन करती है. यह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर साक्षरता का समर्थन करने एवं किताबों से बच्चों के सार्थक जुड़ाव के जरिये सीखने में मदद करने के लिए लाइब्रेरीज को नया रूप देने का काम करती है. बच्चों के बीच पढ़ने और सीखने के प्रति जीवनभर की रूचि जागृत करने के उद्देश्य से ‘पराग’ क्षमता निर्माण पाठ्यक्रम तथा मॉड्यूल्स की पेशकश करती है जो कि लायब्रेरियंस शिक्षकों तथा लायब्रेरी एजुकेटर्स को लायब्रेरी की एक ऐसे इनोवेटिव और क्रिएटिव जगह के तौर पर कल्पना करने में सक्षम बनाते हैं जो सक्रीय तथा उन्मुक्त हों.

टाटा ट्रस्ट्स के बारे में:

इस वर्ष अपनी 125 वीं वर्षगांठ का जश्न मना रहा ‘टाटा ट्रस्ट्स ‘ भारत के सबसे पुराने गैर-साम्प्रदायिक परोपकारी संगठनों में से एक है, जो सामुदायिक विकास के कई क्षेत्रों में काम करता है. स्थापना के बाद से ही, टाटा ट्रस्ट्स ने परोपकार के पारम्परिक विचारों में बदलाव लाने में अग्रणी भूमिका निभाई है, ताकि जिन समुदायों को सेवा दी जा रही है उनके जीवन में प्रभावपूर्ण, स्थाई परिवर्तन किये जा सकें। अपनी योजनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर लागू करते हुए, साझेदारीयुक्त रणनीतियों और अनुदान के जरिये इस ट्रस्ट्स ने शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण, ग्रामीण आजीविका, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के क्षेत्रों में इनोवेशन के साथ काम करते हुए समर्थन दिया और नागरिक समाज तथा प्रशासन एवं मीडिया, कला, शिल्प और संस्कृति को बढ़ाने का काम किया है. टाटा ट्रस्ट्स, निरंतर इसके संस्थापक जमशेतजी टाटा के सिद्धांतों के मार्गदर्शन में कदम बढ़ा रहा है और उनके सक्रिय परोपकार की दृष्टि के द्वारा, यह ट्रस्ट्स सामाजिक विकास में उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाहन कर रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि तमाम पहल और हस्तक्षेपों का राष्ट्रहित से सीधा संबंध है.

अधिक जानकारी के लिए कृपया विजिट करें: http://tatatrusts.org/

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Learn to cater to children’s library needs

Originally posted in DNA: http://www.dnaindia.com/education/report-learn-to-cater-to-children-s-library-needs-2544839 

To promote reading for pleasure through use of children’s literature, Parag initiative of Tata Trusts has come up with first-of-its-kind professional development certificate course

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After conducting a study of 15-20 non-profit organisations working on setting up or initiating libraries for children in rural areas, pan India in 2012, Parag initiative tried understanding key challenges that are faced in scaling quality programme.

The organisation figured one of the key gaps was to provide systematic training to facilitators.

They also noted that library science courses in the country do not educate librarians on special requirements of setting up libraries for children. “Library science departments do not offer any course for children’s librarians and hence the field has remained underdeveloped,” says Swaha Sahoo, Head-Parag Initiative at Tata Trusts.

In 2013-14, team Parag designed their first pilot course for the librarians in Hindi.

On realising that short term workshops and training were inadequate to bring about lasting changes, they came up with an idea of the Library Educator’s Course (LCE), a seven-months course for professionals. “LCE is open to all educators. It’s intended for librarians, development sector professionals, literacy educators and language experts,” affirms Sahoo.

The course has been designed to help practitioners to perceive library as an open creative space for all curricular areas, especially reading for pleasure.

Role of a library educator…

Most government run primary schools don’t have a librarian’s post. However, Right to Education Act (2009) mandates that every elementary school should have a library. Librarians aren’t mere book keepers. They work closely with children and books, continues Sahoo, they should be called as library educators.

Although, it’s a shared responsibility of the teacher, librarian, and parent to introduce children to books and reading, a library educator can be the central pivot to start children’s lifelong friendship with books. A well-trained library educator understands the world of books and can encourage children to read and explore multiple genres, especially the children that come from non-literate homes. “We should definitely keep boards and exams out of the library or the library educator’s role,” says Sahoo, who was an education beat journalist for more than a decade before associating with Parag.

The course…

Offered in Hindi and English, the course is conducted in dual mode – contact sessions and distance mode. The Hindi course is offered directly by Parag whereas the English course is done in partnership with Bookworm, Goa.

The Hindi course starts in May whereas English in April. It has three contact periods totaling 12 days along with distance mode including course readings, assignments, field projects etc.

There are no tests. The students have to do four assignments which they have to submit over the course period and a field project at the end of the year, based on which they will be graded. They are also graded as per the class participation.

While some papers and sessions are planned differently every year, the vision and the focus of the course remains the same. “In the current LEC (Hindi) batch we have participants who have joined on recommendations by their colleagues, who happen to be our ex-students,” affirms Sahoo. LEC’s long term aim is to develop children’s libraries as a separate discipline and to establish the role of trained library educators as crucial to children’s growth and development.

For Hindi: Five days in May, four days in August, and the last one is in November for three days.

For English: Five days in April, four days in July and the last one is in October for three days.

The course has no upper age limit.

Each class consists of 30 students.

No fixed timings.

Fees (highly subsidized): 25,000/- for Hindi, 30,000/- for English. It can be paid in installments.

Talk to ponder

We just winded up the second contact classes of the 3rd batch of Library Educator’s Course and one thing that stayed with me this time was the ‘need to talk’ about literature. As we tried to look at literature with different lenses and understand reader response we stumbled with the fact that perhaps except a few, the opportunity and space to talk about literature seems like a rare occasion or perhaps missing from our lives. A talk from the heart, devoid of any fear of being judged or free of the motive to arrive at the ‘right’ response. LEC brings a range of literature to participants and when it’s time to read or engage with a book in a session, for a participant the outcome in focus overtakes any one-to-one with the text… But often when we pause and ponder during this process or hear out others, what unfolds is a rich personal sharing which fills small group conversations. And it doesn’t always emerge on its own, but is sometimes created and nurtured.

When struck with an abundance of literature in these four to six days of our coming together, time falls short for emotions to unfold and an open sharing. Words fail our articulation. In the daily bustle of life we perhaps forget or overlook our need to talk about what we read. And ordinary schooling doesn’t tell us in any way that we need to talk. As educators we too rush to transfer our understanding to children/teachers and the trap of one right interpretation spreads.

During LEC I realized, everyone had so much within them, so beautifully tied with a memory, an experience, a feeling but it takes a lot for it to emerge.

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A participant expressed her need to talk about a poem on Gujarat riots by Anshu Malviya and the insane violence that is difficult to imagine, someone was drawn to the sadness that a son’s hanging brought to an old father in “Samudr tat par’ by O.V Vijayan, or the happiness that surrounded a dying street child in ‘Maachis bechne wali ladki’ by Hans Christian Andersen or the friendship of Mukand and Riaz amidst the backdrop of partition told so beautifully by Nina Sabnani, reminded a few of us of our own lost friends and the digital age which perhaps makes that loss ‘not so precious’. And there could be much more that is left unsaid and untold. More than anything we would learn or gain from such reading, what became important was our own thoughts about them. How they shaped, what they mean for another reader and for our larger presence and role in our current world. We all perhaps might have read something beautiful in our lives that stayed with us and might have just answered some ‘textbookish’ questions about it. But have we spoken what stirred our heart or what kept bringing that book back on our reading list or kept it away or connected us to something or drowned us in ideas or….the list is endless.

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A participant from a tribal background expressed how people he met always told him ‘to read’ and here in the Library course, friends ask ‘have you read this book?’ and there begins a conversation. This is not a matter of just reading but the identity that is associated with a reader. Perhaps libraries were meant to be such spaces. And against the common belief it is not just a space for the reader but also the non-reader because both are not passive beings of this world and are reading the world continuously.

In my own childhood and while growing up, the experience of a library was that of a ‘Silent’ room where you are with your ‘self’ and the book and your thoughts. What’s the value of sharing? Can any dialogue bring me more than the book tells me and is it important to make? To me personally, ‘talking’ only brings more and I go back to the book and re-think. I re-think about how my mind worked on this and how the other reader interpreted the same thing, what the author is saying to me and why, and why I believe or resent it or accept it with my own lens. As we move ahead with this course, the need to talk about literature or enable this for children’s libraries gets stronger in my head but only when we ourselves have opened our mind to it.

Ajaa is a Faculty with the Library Educator’s Course.

पुस्तकगाडीतील एक दिवस

Written by Pramod Kamble

पुस्तकगाडी (फिरते ग्रंथालय) हा प्रकल्प आदिवासी विकास विभाग व क्वॉलीटी एज्यूकेशन सपोर्ट ट्रस्ट यांच्या सहकार्याने पालघर जिल्ह्यातील दहा आश्रम शाळांमध्ये राबवविला जातो. मुलांमध्ये वाचनाची आवड निर्माण करणे व वाचन संस्कृती रुजविणे हा या प्रकल्पाचा उद्देश आहे. या प्रकल्पाद्वारे मुलांना असंख्य गोष्टीची पुस्तके उपलब्ध करून देणे, उत्तम पद्धतीने वाचून दाखविणे, त्यावर आधारीत लेखन करण्यास प्रोत्साहन देणे, तसेच बालसिनेमे दाखविणे या सारखे उपक्रम घेतले जातात. 

शाळेच्या इमारतीत स्वतंत्र ग्रंथालयाच्या खोलीची व्यवस्था नसते. बहुतेक सगळ्याच आश्रम शाळेतील मुलांची रहाण्याची व्यवस्थाही शाळेतील वर्गातच असते. आजारी मुलं वर्गातच मागील बाजूस झोपलेली असतात. त्यांच्यासाठी स्वतंत्र व्यवस्था नसते. वर्गामध्येच मुलांच्या सामानाच्या पेट्या असतात. बऱ्याच वेळेस पेट्या तुटक्या असतात. त्यांना कुलूप लावण्याची सोय देखील नसते. मुलांना वह्या, पुस्तके, कपडे शाळेकडूनच मिळतात. अभ्यासक्रमाच्या पुस्तकांखेरीज अन्य पुस्तके त्यांना मिळत नाही आणि त्यामुळे आम्ही नेत असलेली गोष्टीची पुस्तके परत न देता मुले स्वत:जवळ ठेवून घेतील आणि त्यामुळे काही पुस्तकं गहाळ होतील हे आम्ही गृहीत धरून चाललो होतो.

 

सोमवारी साकूर कन्या आश्रमशाळेत पोहचता-पोहचता १२.३० झाले. मुख्याध्यापकांना भेटण्यासाठी कार्यालयात गेलो असता नेहमीप्रमाणे ते मिटींगसाठी जव्हारला गेल्याच कळलं. कार्यालयातील शिपायाजवळ सरांकरिता निरोप ठेवला आणि नियोजना प्रमाणे मी पाचवीच्या वर्गावर गेलो. हजेरी घेणं चालू केलं, अचानक माझं लक्ष दाराकडे गेलं. दोन मुली दारात उभ्या होत्या. मी त्यांना आत येऊन बसायला सांगितल्यावर लगेचच वर्गातील मुलींकडून उत्तर आलं की, “ते पाचवीच्या नाय सातवीच्या हाहेत.” मी त्यांना येण्याचं कारण विचारलं तर त्या काहीच बोलल्या नाहीत. मी जागेवरून उठलो व त्यांच्याजवळ जाऊन पुन्हा तोच प्रश्न विचारला. पुन्हा तेच, दोघी ढिम्म, काहीच उत्तर नाही. मी पुन्हा विचारलं “बरं वाटत नाही का?  झोपायचे आहे का? पेटीतून काही सामान काढायचे आहे का?” असं विचारलं अनं बोलता-बोलता त्या मुलीचे नाव चमसरा असल्याच मला आठवलं. पुन्हा मी बोललो “काय झालं चमसरा?” तसं ती धीर करून म्हणाली “सर आमचे वर्गावं ये”. ‘यांचे झालं की तुमच्या वर्गावर येतो’ असं आश्वासन देऊन दोघींना पाठवले. पाचवीच्या वर्गात काम करताना वेळ कसा गेला तेच कळलं नाही. घंटा वाजल्यावर जेवणाची सुटी झाल्याचं आणि दोन वाजल्याच लक्षात आलं. दुपारचं जेवण आटपून गाडीत पुस्तक वाचत बसलो होतो. या सगळ्या गडबडीत चमसरा प्रकरण विसरून गेलो होतो. घंटा वाजली, सुटी संपली, शाळा भरली. सुटी संपल्यावर मुली वर्ग झाडून साफ करतात त्यामुळे आणखी थोडावेळ हाताशी होताच म्हणून स्वस्थपणे पुस्तक वाचतं गाडीत बसून होतो. कानाशी आवाज आला “ सर आमच्याव ये” मी पुस्तकातून डोकं बाहेर काढून पाहीलं तर पुन्हा चमसरा. मी हसलो आणि बोललो “जा वर्ग झाडून साफ करा, मी येतोच.” चमसरा बोलली “सर झाडेल” (सर झाडला आहे)  थोड्या आश्चर्यानी मी म्हणालो “झाडला ? बरं ठीक आहे. व्हा पुढे, मी येतोच”.  मला गाडीतून पुस्तकं, लेसनप्लान, हजेरी रजिस्टर शोधायला थोडा वेळ गेला, तोपर्यंत त्या जवळच घुटमळत होत्या. सगळं सामान घेऊन मी वर्गाच्या दिशेने चालू लागलो. त्या मा‍झ्यासोबतच चालत होत्या.

सातवीच्या वर्गात पोहचलो, हजेरी झाली. मागील वेळेस अर्धे वाचलेलं पुस्तक वाचून पूर्ण केलं. पुस्तकातील विषयाला धरून झाडे नष्ट झाली तर काय होईल या विषयावर चर्चा चालू केली पण मुलींचा फारसा सहभाग दिसत नव्हता, त्यांची कसली तरी चुळबुळ चालू होती. न राहून चर्चा बंद करीत मी विचारलं “काय झालं.” एक मुलगी बोलली “सर पुस्तका.” “पुस्तकांच काय?” मी विचारलं. “भासलेली पुस्तका” (हरवलेली पुस्तकं) हातात ८-१० पुस्तक घेऊन उभी राहत चमसरा बोलली. मी पुढे जाऊन पुस्तक हातात घेत विचारलं, “सापडली तर पुस्तकं ”. आठवड्या भराच्या गडबडीत विसरून गेलेलं मागच्या सोमवारचं पुस्तक प्रकरण मला आठवलं.

  दयानंद सोबत पुस्तकांचे ऑडीट करायला आलो होतो त्या वेळेस लक्षात आलं की सातवीच्या वर्गातून १२ पुस्तकं परत आली नाहीत. मी थोडासा चिडूनच वर्गात गेलो आणि ज्या मुलींनी पुस्तक परत दिली नहीत त्यांना उभं केलं. पुस्तकं न परतवण्याचं कारण विचारलं. सगळ्यांकडून एकच उत्तर “भासलं” (हरवलं). हरवलेल्या पुस्तकाची किंमत अथवा दंड घेणं हा पर्याय माझ्याजवळ उपलब्ध नव्हता. मुलींना घडलेल्या घटनेचे गांभिर्य लक्षात आणून देणे गरजेच होतं. मुलीं जवळील सगळी पुस्तकं जमा केली व त्यांना सांगीतलं हरवलेली पुस्तकं मिळाली नाहीत तर त्यांची किंमत मला भरावी लागेल. माझे नुकसान होत असेल तर यापुढे कोणालाच पुस्तक वाचायला देणार नाही आणि तुमच्या वर्गावर देखील येणार नाही असे त्यांना सहजच सांगीतले.

गेल्या वर्षभरात दहा ते बारा वेळा पुस्तक देवघेव प्रक्रिया सर्व शाळांतील मुलांसोबत झाली होती. कार्यक्रमाच्या सुरवातीच्या दोन महिन्यांत पाचवी, सहावी आणि सातवी इयत्तेच्या वर्गातील मुलांना प्रत्येक भेटी दरम्यान एका तासिके पुरती पुस्तकं वाचायला देऊन परत घेतली जात. हळूहळू मुलांना पुस्तकांची आवड निर्माण झाली व ती पुस्तकं ठेवायला मागू लागली. मुलांना पुस्तक देण्यापूर्वी त्यांची काळजी कशी घ्यावी, कशा पद्धतीने हाताळावे यासारख्या सूचना वारंवार दिल्या गेल्या. पुस्तकं तुमच्यासाठीच आहेत, जपून वापरली तरचं ती मागे शिकत असलेल्या तुमच्या बहीण-भावंडांना वाचायला मिळतील याचीही जाणीव करूण देण्यात आली. मुलांकडून पुस्तकं नीट वापरली जातील असे आश्वासन मिळाल्यानंतरच मुलांना पुस्तकं ठेवायला देण्यात येऊ लागली.

क्वचित आश्रमी मुलांकडील एखाद दुसरे पुस्तक हरवल्याचं किंवा पेटीचे कुलूप तोडून चोरी झाल्याच्या घटना घडत. पण मुळ समस्या दुसरीच आहे असं नंतर आमच्या लक्षात आलं. आश्रमशाळेत एका वर्गात ८० ते १०० मुलं असतात. उपलब्ध जागेची व्यवस्था पहाता सगळ्याच मुलांची शाळेत रहाण्याची सोय करता येत नाही. जवळच्या गावतील, पाड्यातील मुलं अशा परिस्थितीत घरून ये-जा करतात. या मुलांना डे-स्कॉलर म्हणतात. डे-स्कॉलर मुलांना घरी न्यायला दिलेली पुस्तक हरवल्यामुळे किंवा फाटल्यामुळे परत मिळत नाहीत. अशा मुलांकडून हरवलेल्या पुस्तकांची संख्या मोठी होती असे पुस्तक देवघेव रजीस्टर तपासल्या नंतर कळाले.

आता मा‍झ्या लक्षात आलं की चमसरा मी आल्या पासून सारखी का माझ्या मागे लागली होती ते. हाततील पुस्तकं मोजली. ती १० होती. पुस्तक देवघेव रजिस्टर मध्ये ती मिळाल्याची नोंद केली पण अजूनही २ पुस्तके परत आली नव्हती. त्याबद्दल मुलींशी बोललो तर त्या म्हणाल्या, ”भासेल पुस्तकाचं पैसं आमी देव, पन वर्गावं इजोस हो” (हरवलेल्या पुस्तकांचे पैसे आम्ही देतो. पण आमच्या वर्गात या.) मी होकार दिला आणि बाहेर निघालो.

आश्रमशाळेतील पुस्तेक नेहमी कपाटात ठेवली जातात आणि त्या मागे एक उत्तर ऐकायला मिळते  ते म्हणजे मुले पुस्तके फाडतात. म्हणजे अप्रत्यपणे मुलांना पुस्तकांची किंमत कळत नाही असं खरं तर त्यांच म्हणणं असतं. पण या निमित्ताने का होईना वरिल म्हणण्याला काही पाठींबा मिळत नाही. उलट पुस्तकांची आवड मुलांमध्ये निर्माण झाली तर ती पुस्तकांची काळजीही घेतात. त्यांना त्यांच्या जबाबदारीची जाणिव असते हेच या प्रसंगातून दिसून येते.   

 

                                                                 प्रमोद कांबळे

Pramod Kamble works with Quality Education Support Trust (QUEST), Maharashtra and is a participant in the Library Educators’ Course (Hindi batch), 2017.

Library Educator’s Course Experience

Written by Shraddha | Originally posted in Bookworm’s website: http://www.bookwormgoa.in/2017/04/23/library-educators-course-experience/

When I was first asked if I wanted to do the Library Educator’s Course, I felt excited at the opportunity to learn more about library work. I was also a bit apprehensive about managing my work and the course simultaneously. But Sujata, my director, put all my fears to rest when she told me that I have her full support.

So with butterflies in my stomach, I went for the first contact session. I did not know what to expect. I was astounded at the diversity in the participants; there were people all over the country and most interestingly, of different academic backgrounds.

I have been to many academic conferences before; most were very dry and I just couldn’t wait for them to end. But LEC redefined it for me; a complex topic like Rosenblatt’s Reader-response theory was explained by incorporating drama in the session. The essential elements of a library were imparted to us through a game with woolen yarn. We learnt about the library movement in India from the ancient to modern times by making chronology charts.

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But the best part was the discussions that I had with my fellow participants. I was exposed to many new ideas and ways of thinking; whether it was a poem on caste discrimination or a book review, whether it was deconstructing a research paper or building a mini library, I was fascinated to just listen to their perspectives, and how different they are from my own.

I felt honored to meet the author of the book ‘Under the Neem tree’, Anuradha Rao. Our book review exercise was enriched by the thoughts of this humble and gracious writer. I learnt about the troubles faced by the tribal children in Chattisghar and Jarkhand through Neeraj and Divya who have worked extensively in those regions. I was delighted to meet Namgyal and know her plans for children that come to her library in the Tibetan settlement of Mundgod.

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Through JoAnn, who had come from Chennai, I was familiarized about the history of East Indians and the works of Neil Gaiman. I had a very interesting conservation with Parveen about Emotional Intelligence, and learnt about ‘Namma Library’ (‘Our Library’ in Kannada) from Padma and Vinitha (who also happens to be a certified flight instructor).

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On the last day of the conference, I was sad to say goodbye to all these remarkable people. For me, this LEC experience was one- of- a – kind that enriched me both personally and professionally. I look forward to meeting all the people again for the next session.

LEC Contact 1: Paraphrasing Manisha Choudhry, Head of Content, Pratham Books, Author & Translator

We have an opportunity with children’s literature in this country. There are as many languages as there are childhoods in India and we need as many stories in print. Stories and literature are necessary in every language for every child. When children see themselves in in a story, they feel comforted. They feel validated and included. The question of what sort of literature to publish, with what kind of representation and quality is important but also difficult to answer. Children who read English and Hindi think poorly of regional languages. English is often considered superior and drawing attention to regional and lesser spoken languages becomes an uphill task. If I had the power, I would make a book about and for every child.

Children learn everywhere. Children learn from experience. Children learn from magic. There is much scope for magic in children’s literature. Some children like nonfiction, some fantasy. When children’s literature isn’t available in a child’s mother tongue, you deprive a child’s of her language and hence, a part of life and her brain. If you teach a child a language alien to her and comfortable to you, you alienate the child from her family, with whom it becomes increasingly difficult to communicate for the child.

Children learn from experience and how you provide the open and happy library experience will determine their relationship with books. Libraries should be free spaces and children shouldn’t be restricted by levels in their reading. Choice and autonomy are important but also difficult to provide, because as adults and caregivers we feel we know better. Children must be heard and listened to. Children learn to decide and make them own decisions if given the chance, if we are patient.

It is important for a child to talk about her decision in choosing a particular book, reading a book and her experience with a book. We must direct a child as little as possible. We seem to know better all the time because we worry too much. The cycle will continue unless we stop. We worry too much about the socially accepted definition of what makes a good girl and what makes a good boy.

It is important for not only children, but all of us, to meet more people, speak more languages, read more languages. The effects of participating in a plural world are great and positive. A child will learn to reflect critically the more she reads. What education and independence do we have in mind when we try to school children? What is the goal? Do we want a thinking child or a child who conforms? What we want determines what books we consider good and what books we consider not so good or inappropriate.

Many Indian authors have written children’s literature but they never publicized it or sent it for reprint. Most famous authors and Sahitya Akademi award winners have written children’s literature too. Amir Khusro, Mirza Ghalib, Mohd Iqbal, Dr Zakir Hussain, Prem Chand in Hindi, Rabindranath Tagore, to name a few. But the books are either missing or inaccessible. That shows you the status of children’s literature in the country. Good children’s literature can provide great pleasure to adults as well.

If all of us agreed that children’s literature is important, then perhaps we would have greater support for children’s literature. Our habit of seeing education as purely academic will harm us. We will realize it the day when all rivers are dry, all trees have been cut. Children’s literature will play a critical role in expanding a child’s scope of learning beyond exams into critical thinking.

ग्रंथालय उपक्रम

Session by Pradeep, PSS

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ग्रंथालय उपक्रम: चित्रांवरून गोष्ट, गाणी लिहणे.

इयत्ता: तिसरी

पूर्वतयारी: वर्तमानपत्रातील विविध चित्रे कापून ती एका फुलस्केप कागदावर एक अशी चिटकवली.

कृती: प्रत्येक मुलाला एक चित्र असलेला कागद देण्यात आला. प्रत्येकाने

आपापल्या चित्राचे बारकाईने निरीक्षण करावयाचे आहे, त्या चित्रावरून ज्यांना गोष्ट सुचेल त्यांनी गोष्ट, ज्यांना गाणी सुचतील त्यांनी गाणी

लिहावी असे सांगितले.

मुलांकडून खूप वेगवेगळ्या प्रकारचे लेखन आले. त्यातील २ नमुने सोबत जोडले आहेत.

विद्यादेवी काकडे, ग्रंथपाल, कमला निंबकर बालभवन

हॅनाची सुटकेस

Written by : Vidyadevi, PSS

Found on savingforsomeday.com

जुलै महिन्यात मी “हॅनाची सुटकेस” पुस्तक वाचले. हे पुस्तक चांगले आहे हे खूप लोकांकडून एकले होते.

दोन दिवसात पुस्तक वाचून पूर्ण झाले.हे पुस्तक उत्कंठावर्धक तर आहेच.तसेच एक लहान मुलगी कथेतील मुख्य पात्र आहे.मुलांचे भावविश्व अतिशय सुंदर रेखाटले आहे. आनंद, दु:ख, भीती, द्वेष, करुणा, सहानुभूती, सहकार्य, आदी कितीतरी भावनांमधून वाचक देखिल या पुस्तकाद्वारे प्रवास करतो. शेवटी शांतता व प्रेमाचा संदेश देणारी फ्युमिकोची कविता मन हेलावून टाकते. हे पुस्तक कथा आपल्यापर्यंत पोहचू शकण्याचे कारण म्हणजे फ्युमिकोची जिद्द ,चिकाटी होय.

हे पुस्तक इयत्ता ६ वी च्या विधार्थ्यांना वाचून दाखवण्याचे ठरवले. पहिल्याच तासाला मुलांना जगाचा नकाशात जपान व चेकोस्लोव्हाकिया हे देश दाखविण्यास सांगितले.नंतर जपान मधील फ्युमिको काय काम करते.त्यांच्या संस्थेत हॅनाची सुट्केस कशी येते.त्या सुटकेस विषयी “स्मॉल विंग्स’ मधील मुलांच्याही मनात कुतुहल निर्माण होते.हॅनाची ,सुट्केसची अधिक माहिती मिळवण्याचा प्रयत्न करते.

पहिल्याच प्रकरणाचे प्रकट वाचन करताना छलछावणी, दुसरे महायुद्ध, नाझी, हिटलर, ज्यू ,आदी शब्दांचा अर्थ मुलांना सविस्तर सांगावा लागला. हिटलरची आत्मचरित्र असलेली पुस्तके मुलांना दाखवली.मुलांनी अनेक प्रश्न विचारले.हिटलर असे का वागत होता ? युद्ध का झाले ? ,इ. यावर अधिक चर्चा न करता कथा पुढे वाचण्यास सुरवात केली.{कौस्तुभ म्हणाला,माझ्या ग्री हिटलरच्या कडी आहेत ,त्या पाहायला आणू का?}

हॅनाचा सुरवातीचा काळ सुखाचा होता.तो वाचताना मुले आनंदात होती.जसजसे युद्धाची चाहूल, बातम्या,ज्यू लोकांवरची बंधने, हॅना-जॉर्ज यांची शाळा बंद झाली. हॅना जॉर्ज अस्वस्थ मनस्थितीत होते.त्यांनी आपले विचार, भावना, इच्छा एका कागदावर लिहून काढले वएका बाटलीत भरून ती बाटली घराच्या बागेत खड्डा खणून ती बाटली पुरली. हा प्रसंग मुळे गहिवरून एकत होती.हॅना-जॉर्जचे दु:ख मुलांच्या चेहऱ्यावर दिसत होते.

पुढच्या प्रत्येक तासाला मुले पटकन बसून आतुरतेने ‘ताई पुढची गोष्ट वाचा.’ म्हणू लागले. मुळे कथेत रमली होती.काहींनी ते पुस्तक नावावर दयावे,अशी मागणी केली. दोन विधार्थीनिंनी पुढचा तास येईपर्यंत ते पुस्तक पूर्ण वाचले.गायत्रीने हे पुस्त्ल आधी वाचलेले होते, तरी ती तितक्याच तन्मयतेने गोष्ट एकत असे.

हॅना-जॉर्जची पुढे झालेली हालअपेष्टा एकून मुलांनाही वाईट वाटत होते. प्रसंग वाचताना मीही मुलांशी चर्चा कृ शकले नाही.शेवटी मात्र जेव्हा फ्युमिको जॉर्जला जपानला बोलावते. जो कार्यक्रम करते,त्याचे वर्णन एकने मुलांना आवडले.

मुलांना या पुस्तकातील जो प्रसंग सर्वात जास्त लक्षात रहिला त्याचे चित्र काढण्यास सांगितले. यात मुलांनी य्धाच्या बातम्या चोरून अएक्ताना मुले ,छळछावणीतील जॉर्ज आणि हॉनाची भेट, छळछावणीतील गुपचूप चाललेला चित्रकलेचा तास, हॅना जॉर्जने आपल्या इच्छा बाटलीबंद करून बागेत पुरतनाचे चित्र, फुमिको मुलांबरोबर बोलताना असे प्रसंग रेखाटले.

शेवटी युध्द कशामुळे होत असेल?, तुम्हाला केव्हा केव्हा रंग येतो?, तुम्ही त्यावर काय शांततेचे मार्ग सुचवलं? ,इ. चर्चा केली.मुलांनी सांगितलेली करणे-लं भावाची चूक असूनही मलाच ओरडतात,एखाद्याला ज्यादा वाटणी एखाद्याला कमी, एखाद्याला पुन्हा पुन्हा संधी, चिडवणे,इ. मुलांनी रंग नियंत्रित करण्याचे शांतता मार्ग देखिल सांगितले.

Image courtesy: savingforsomeday.com