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कहानी और “और एक कहानी”

     Written by Dilip Sharma

सिरोही जिले के आबू रोड ब्लॉक में अर्ली लिटरेसी प्रोजेक्ट के तहत 10 राजकीय विद्यालयों की प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के साथ लाइब्रेरी कार्य करने के दौरान टैबलेट आधारित ई-पुस्तकों के संकलन (ई-रीडर) का अनुप्रयोग हुआ l इस प्रोजेक्ट, जिसको “और एक कहानी” नाम दिया गया, के साथ काम करने के दौरान बच्चों ने जो प्रतिक्रियाएं दी, उससे कई सवाल मेरे मन में घर कर गए l टैबलेट जैसे उपकरण पर बच्चों ने पहली बार जब अपनी नन्ही उंगलिंयां फिराते हुए अपनी दुनिया के बारे में खोजना शुरू किया तो उनके चेहरे पर उत्सुकता एवं आनंद के भाव बिखरे देख बहुत अच्छा लगा l बोलती किताबों और पात्रो की गतिशील रंगीनीयत ने बच्चों को अपनी ओर तुरंत व सहज ही आकर्षित कर लिया और सबसे पहला सवाल मन में खड़ा हुआ – क्या किताबें पहली बार में ऐसा कर पाती ?

टैबलेट पर कुछ महीने अंगुलियां फिराते-फिराते बच्चों ने कहानियों की ई-किताबों से दोस्ती कर ली हो ऐसा लगने लगा, पर सब कुछ खोज लेने की बाल मन की चाहत और इसके लिए उनकी लम्बी छलांगों को सहज प्रवृत्ति मान कर अपने जैसी दुनिया की खोज करते देख दूसरा सवाल आया की ये दोस्ती टैबलेट से है या किताबों से ?

कुछ समय और बीत जाने पर टैबलेट में कहानियों और खेल-खेल में टेक्स्ट पढ़ना सीखने के अनुप्रयोगों से बच्चों का लगाव बढ़ता ही चला जा रहा है, और उनको जब तक रोका न जाये तब तक टैबलेट पर कुछ न कुछ करते रहने से एक और सवाल उठा की बच्चों के लिए अपनी इच्छा से कहानियां पढ़ने और आनंद देने वाले खेल खेलने के बीच हमारी किताबें कहा है ? और इनकी बच्चों को कितनी ज़रुरत है ? और ज़रुरत है भी या नही ?

मेरे लिए इन सवालों के जवाब ढूंढना भी बहुत रोचक रहा और ये जवाब ढूंढ़ने के लिए लाइब्रेरी एजुकेटर कोर्स (LEC) ने काफी मदद की l सबसे पहले यह जानना कि ये बच्चे जिस परिवेश से आते है उनमे किताबों के अलावा मोबाइल, टैबलेट और टीवी जैसे दृश्य-श्रव्य साधनों की कितनी जगह है ? तो पता चला की लगभग सभी बच्चों ने मोबाइल अपने गाँव एवं घर में अपने बड़ों के पास देखे हैं जिसमे वो बात करने के आलावा गाने, विडियो और फोटो देखकर आनंदित होते हैं लेकिन कुछ ही बच्चों ने कभी मोबाइल हाथ में लेकर चलाया था l और अधिकतर बच्चों के घर में टीवी नहीं है लेकिन वो टीवी के बारे में जानते हैं l अगर किताबों की बात करे तो इक्का दुक्का बच्चों के घर में ही कहानियों एवं कविताओं की किताबें उपलब्ध थी l कुछ विद्यालयों में बच्चों का पाठ्य पुस्तकों के इतर भी लाइब्रेरी की पुस्तकों एवं बाल साहित्य का अच्छा खासा संग्रह उपलब्ध था परन्तु बच्चों की उनसे सहज संवाद की स्थिति नहीं देखी गई l

एक और बात जो भाषा के सन्दर्भ में पता चली कि बच्चों के घरों में पूर्णतया स्थानीय भाषा (गरासिया एवं मारवाड़ी) ही बोली जाती थी जो शायद उनके माता पिता की औपचारिक हिंदी की शिक्षा के आभाव के कारण था l हिंदी से इन बच्चों का वास्ता केवल शिक्षकों द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों एवं कक्षाओं में पढ़ाने के दौरान ही पड़ता था और अधिकतर बच्चे हिंदी में पढ़ने के लिए वर्णों, शब्दों एवं वाक्यांशों के साथ जूझते हुए किताबों में लिखा पढ़ने में असहज ही महसूस कर रहे थे l तो इस पूरे सन्दर्भ में बच्चों की शुरूआती दोस्ती टैबलेट से थी और कही न कही टैबलेट में भी एनीमेटेड विडियो युक्त कहानियों से और उन में भाषा सम्बन्धी रोचक खेल अनुप्रयोगों से भी क्योंकि वो उन्हें देखने सुनने एवं समझने के बाद आनंद दे रही थी l लेकिन चित्रकहानियों एवं अधिक टेक्स्ट वाली कहानियों की ई-पुस्तकों में बच्चों की रूचि ज़्यादा नहीं थी l ई-लाइब्रेरी के दौरान पढ़ने में रूचि पैदा करने वाली गतिविधियों जैसे रीड अलाउड, सह पठन एवं बुक टॉक ने कुछ बच्चों में चित्र कहानियों को पढ़ने के लिए जरुर थोड़ी रूचि जगाई थी l लेकिन फिर भी बच्चों ने प्रिंट किताबों से दोस्ती नहीं की थी l

LEC के दौरान फील्ड कार्य शोध हेतु जब दो विद्यालयों में प्रिंटेड किताबों के साथ जब इसी तरह की गतिविधियां नियमित की जाने लगीं तो बच्चों ने तुरंत ही किताबों को भी टैबलेट कि तरह अपना दोस्त बनाना शुरू कर दिया l यह देखकर अचम्भा ही था की दोनों साधनों में उनके आकर्षण का केंद्र कहानियां ही थी l एक फर्क जो नज़र आया वो यह था की बच्चे ई-पुस्तकों के बजाय पुस्तकों को ज़्यादा गंभीरता से ले रहे थे l जैसे कहानी को पूरा देखना या पढ़ना, ई-पुस्तकों के बजाय पुस्तकों के चित्रों पर ज़्यादा गौर करना l और गौर करने वाली बात यह भी थी कि 120 ई-पुस्तकों के संग्रह में बच्चों को 40 के लगभग ई- पुस्तकें ही पढ़ने में ज़्यादा अच्छी लगीं l बस सभी एनिमेटेड विडियो वाली कहानियां बच्चों ने खूब पसंद की l तो मेरे पहले और दूसरे सवाल का जवाब मेरे सामने था की बच्चों के लिए टैबलेट एवं “और एक कहानी” शुरुआत में आकर्षण का केंद्र थी और इसकी मुख्य वजह थी एनिमेटेड विडियो युक्त कहानियां, परन्तु बच्चों के सामान्य पुस्तकों से एक बार जुड़ने के बाद पुस्तकों ने भी वही काम किया जो ई-पुस्तकों ने किया था l एक बार बच्चों का जुडाव कहानियों से होने के बाद बच्चों ने दोनों तरह की पुस्तकों को पढने में तरहीज दी l एक बात और निकल कर सामने आई कि खेल खेल में हिंदी भाषा सीखने के लिए टैबलेट में भाषा-अनुप्रयोगों को भी बच्चों ने खूब पसंद किया l

जब कुछ समय बीत जाने पर बच्चों के लिए टैबलेट (और एक कहानी) और कहानियों की किताबें सहज उपलब्ध होने  लगीं तो अचानक ही यह देखना बहुत ही रोचक रहा कि कुछ बच्चों ने अपनी पसंद की कहानी पढने के लिए टैबलेट की जगह सामान्य पुस्तक को चुना l पर इस तथ्य की पुष्टि के लिए मुझे लगता है कि बच्चों के साथ “और एक कहानी” और पुस्तकों के साथ लाइब्रेरी के समग्र आयामों को ध्यान में रखते हुए कुछ और समय बिताना आवश्यक है l

पर अब तक के “और एक कहानी” एवं पुस्तकों के सफ़र में यह बात तो साफ़ साफ़ पता चल चुकी है कि बच्चों के लिए टैबलेट और एनिमेटेड पुस्तकों से जुड़ना बहुत आसान था पर दूसरे प्रकार की ई-पुस्तकों के साथ यही बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती जब तक बच्चों के साथ लाइब्रेरी आधारित द्रश्य-श्रव्य-पठन गतिविधियां नहीं की जाएँ l वही कुछ समयोपरांत बच्चों को कहानियों से जुड़ने के लिए प्रिंट किताबों ने भी वही काम किया जो कि टैबलेट और “और एक कहानी” ने किया था l और कहीं कहीं यह संकेत भी मिले कि कहानियों की किताबों के साथ बच्चों का जुड़ाव ई-पुस्तकों में कहानियों को पढ़ने की तुलना में ज़्यादा गहरा था जहाँ बच्चों ने चित्रों को देख कर कहानी समझने, कहानी के भावो को आत्मसात करने एवं अपनी प्रतिक्रियाये देने में ज़्यादा संवेदना दिखाई l पर यह दावे के साथ कहना शायद थोड़ा जल्दबाज़ी भरा निर्णय होगा l इसके लिए कुछ और समय  ई-पुस्तकों एव प्रिंट पुस्तकों को एक ही कसौटी पर कसना होगा व यह देखना होगा कि एसा किस वजह से हो रहा है l

मेरे मन की शंका – क्या डिजिटल तकनीक एवं ई-पुस्तकों की वजह से प्रिंट पुस्तकों के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जायेगा? –  इसका एक अपुष्ट जवाब तो मुझे मिल ही गया की शायद नही, निकट भविष्य में तो बिलकुल नहीं क्योंकि सबके लिए जहाँ डिजिटल तकनीक एवं ई-पुस्तकों की सहज उपलब्धता अभी भी दूर की कौड़ी है, वही दीर्घ काल से चली आ रही पुस्तक संस्कृति ही बच्चों में उन मानवीय संवेदनाओ का विकास कर सकती है जो कि आभासी न होकर वास्तविक है l

एक पुस्तक अपने अस्तित्व का अहसास दे सकती है पर एक ई-पुस्तक शायद नहीं l

 

Dilip Sharma works with Center for micro Finance (CMF) as Block Anchor (Education), based out of Sirohi, Rajasthan and is a participant in the Library Educators’ Course (Hindi batch), 2017.

Source: Issue 4, Torchlight Journal published by Bookworm, Goa http://journal.bookwormgoa.in/

Library Educator’s Course English 2018

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Parag Children’s Library unconference 2018

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Parag Children’s Library unconference 2018

Diversity in Children’s Library & Collection

 

About Theme: Today, more than ever, we need to affirm and preserve our multi-lingual and multi-cultural society. Children must grow up respecting and understanding others who may look different from them and have different beliefs, customs and religions. Parag believes multicultural literature fosters positive self-esteem, has the ability to nurture respect, empathy and acceptance among all students. As such the roles of children’s literature and libraries become critical.

 

Date: February 8, 2018

Venue: Sanskriti Kendra, Anand Gram, Mehrauli-Gurgaon Road, New Delhi

To Register for Conference & masterclass Click Here

Schedule

9 to 9:30 am: Registration and tea

9:45 am: Key Note Address by Ms. Urvashi Butalia, Founder and CEO, Zubaan

11 am: Opening up of the Theme through breakout sessions by-

             Proiti Roy, Children’s Illustrator

             Sayoni Basu, Editor, Duckbill Books

             Samina Mishra, Filmmaker & Author

12:30 am: Presentation of Experiences by Library Educator’s Course Alumni

1 to 2 pm: Lunch

2 to 5:30 pm: Master Class – ‘How to make your Library & Collection Diverse’, in English (led by Sujata Noronha) and Hindi (led by Ajaa Sharma)

 

Masterclass takeaways:

  • Understanding of key concepts — unconscious bias, cultural appropriation and intersectionality
  • Ability to recognise common problematic stereotypes, tropes and stances in texts
  • Ability to assess the diversity and inclusiveness of a collection
  • Ability to develop and examine lesson plans within the context of diversity
  • Tools, tips and advice on how to better diversify your collection and displays

 

Primary Audience: Librarians, school teachers who work with collections, community educators, and students interested in children’s literature and literacy

 

Resource:

Sujata Noronha, Director Bookworm Trust, Goa

Sujata is an educator with an intense experience of working with books and children in diverse communities and contexts. She leads the LEC English course offered by Bookworm with the support of Parag and teaches courses on Literacy and Education besides directing the work of Bookworm Trust.

Ajaa Sharma, Manager (Libraries and Capacity Building), Parag

Ajaa leads the Library Educator’s Course at Parag as a Core Faculty. She has an experience of over a decade in the education sector across different regions, with extensive work in the field of girls’ education and community engagement with elementary education.

 

 

 

शहर में सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ टाटा ट्रस्ट्स द्वारा संचालित पुस्तकालय शिक्षकों एक अद्वितीय कोर्स

भोपाल,नवंबर 24, 2017. टाटा ट्रस्ट्स की पहल ‘पराग’ द्वारा आज शहर में पुस्तकालय क्षेत्र में कार्यरत प्रैक्टिशनर्स के व्यावसायिक विकास लिए चलाये जा रहे अनूठे लायब्रेरी एजुकेटर्स कोर्स (एलइसी) के सफल समापन की घोषणा की गई. इस कोर्स में आठ राज्यों से प्रतिभागियों ने नामांकन करवाया था जिनमें मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, दिल्ली तथा गुजरात शामिल हैं.

एक प्रोफेशनल डेवलपमेंट कोर्स के तौर पर एलईसी को ‘टाटा ट्रस्ट्स’ द्वारा विकसित किया गया है और भोपाल में इसे ‘हिंदी’ भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है. लाइब्रेरियंस, शिक्षकों तथा अन्य पेशेवरों के लिए डिजाइन की गई यह पहल बच्चों के लिए एक उन्मुक्त और रचनात्मक लायब्रेरी की स्थापना और संचालन के मुद्दे को केंद्र में रखती है. एलईसी को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि यह पेशेवरों को ऐसी लायब्रेरी की कल्पना करने को प्रेरित करती है जो सभी बच्चों के लिए एक उन्मुक्त तथा रचनात्मक स्थान के तौर पर साकार हो सके. इसके तीसरे संस्करण में इस कोर्स में ऐसे 30 प्रतिभागियों का नामांकन किया गया जो विभिन्न एनजीओ के जरिये ग्रामीण जनजातीय या शहरी गरीब क्षेत्रों/निचली बस्तियों में कार्यरत हैं और लायब्रेरी के साधनों के साथ बच्चों तथा स्कूल लायब्रेरियंस में पढ़ने की रूचि को बढ़ावा देकर स्कूली शिक्षा के स्तर को और सुधार के लिए काम कर रहे हैं. 

ड्युअल मोड में आयोजित इस कोर्स में कॉन्टैक्ट सेशंस (सम्पर्क सत्र) तथा दूरस्थ शिक्षा शामिल है. 7 माह की अवधि का यह कोर्स प्रतिभागियों को निम्न बिंदुओं में सक्षम बनाता है-

* शिक्षा के क्षेत्र में लायब्रेरी/पुस्तकालय की महत्वपूर्ण भूमिका को समझना और बच्चों का पुस्तकों के साथ जीवनभर का रिश्ता कायम करना

* अपने शैक्षणिक प्रयासों में निहित लायब्रेरी कार्यों के लिए एक व्यावसायिक दृष्टी का विकास और संवाद करना

* बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले साहित्य की पहचान करना और उससे जुड़ना

* यूजर्स/उपयोगकर्ताओं से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देने के साथ स्कूलों और प्रोग्राम साइट्स के लिए लायब्रेरी कलेक्शन की संभाल करना

* किताबों से जुड़ी सार्थक गतिविधियों के संचालन द्वारा बच्चों के लिए साहित्य को जीवंत करना

* बच्चों के विशिष्ट संदर्भों और अलग अलग रुचियों के हिसाब से प्रतिक्रिया देना

* स्कूलों तथा सामुदायिक स्थलों पर बच्चों के लिए जीवंत पुस्तकालयों की स्थापना और संचालन करना

* कार्यान्वयन योजनाओं का विकास करना तथा लायब्रेरी क्षेत्र में कार्यरत स्टाफ को ऑन-साईट सहायता की पेशकश करना

* निरंतर पुस्तकालय के उपयोग को सुनिश्चित करने हेतु माता-पिता तथा विभिन्न समुदायों की मदद से रणनीति बनाना

* लायब्रेरी के काम के संदर्भ में जानकार और प्रभावी प्रोग्राम मॉनिटरिंग सिस्टम डिजाइन करना

* देशभर में लायब्रेरी एजुकेटर्स के समुदाय के साथ नेटवर्क स्थापित करना

इस संबंध में जानकारी देते हुए, सुश्री अमृता पटवर्धन, हेड एजुकेशन एन्ड स्पोर्ट्स,टाटा ट्रस्ट्स, ने कहा-‘टाटा ट्रस्ट्स की पहल ‘पराग’, बच्चों के बीच पढ़ने को बढ़ावा देने के विचार पर केंद्रित है. लायब्रेरी एक ऐसा स्थान है जहाँ बच्चे किताबों के अच्छे संग्रह के साथ जुड़ते हैं. जीवंत पुस्तकालयों को पेशेवर प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होती है जो अच्छे किताबों के संग्रह के साथ बच्चों को जोड़ने की महत्ता को समझ सकें और जिनमें ऐसा कौशल व दृष्टि हो जो विभिन्न रुचियों वाले शिक्षार्थियों के लिए लायब्रेरी को सक्रिय बना सकें। इस कोर्स के जरिये, हमारा लक्ष्य इस क्षेत्र में आये अंतर को दूर करना है और इस सिलसिले में इस बैच के हिस्से के तौर पर 29 कुशल और प्रशिक्षित शिक्षकों के कैडर का निर्माण करने पर हमें गर्व है.’

इससे आगे जानकारी देते हुए, सुश्री अजा शर्मा, फैकल्टी तथा लीड- लायब्रेरियंस एन्ड कैपेसिटी बिल्डिंग, पराग इनिशिएटिव, टाटा ट्रस्ट्स ने बताया-‘भोपाल को इसकी समृद्ध संस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है और यह भारत में कलाकारों के केंद्र के रूप में भी ख्यातिप्राप्त है. यही कारण है कि हमने एक वर्ष पूर्व हमने भोपाल में इस कोर्स को आरम्भ किया। एक बच्चे को सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों से समृद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि लायब्रेरी एजुकेटर्स तथा शिक्षक संदर्भों का निर्माण करें और पढ़ने तथा किताबों के बीच में एक रचनात्मक संबंध बनायें। हमें आशा है कि इस कोर्स के जरिये हम उच्च गुणवत्ता वाले लायब्रेरी एजुकेटर्स के एक कैडर को प्रस्तुत करने में सक्षम होंगें, ऐसे एजुकेटर्स जो कम उम्र में ही बच्चों के समग्र विकास में योगदान देंगे तथा इन सकारात्मक लायब्रेरी से जुड़े अनुभवों को उन बच्चों के लिए उपलब्ध कराने में सक्षम होंगे।’

पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों के बड़े प्रतिशत के लिए, स्कूल लाइब्रेरीज बच्चों के साहित्य तक पहुँच बनाने का सर्वोत्तम स्रोत होती हैं. हालाँकि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब भी करीब 74 प्रतिशत स्कूलों में फंक्शनल लाइब्रेरीज नहीं हैं (वैल्यूनोट्स, 2013 के अनुसार). शिक्षा से जुड़े शोध भी बच्चों के पाठ्यपुस्तकों तथा कोर्स संबंधी मटेरियल के अलावा अन्य अच्छी पुस्तकों तथा रीडिंग मटेरियल से जुड़ने के महत्व पर जोर देते हैं, ताकि उनकी पढ़ने के दायरे में विविधता आये और उनकी कल्पना में विस्तार हो. 

पराग, के बारे में:

पराग, टाटा ट्रस्ट्स का फ्लैगशिप कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य उच्च गुणवत्ता वाली पुस्तकों की उपलब्धतता तथा उन तक उन तक पहुँच बनाने में सहायता कर साहित्य को हर बच्चे के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना है. यह पहल भारतीय भाषाओं में बच्चों की पुस्तकों तथा साहित्य के विकास एवं प्रसार का समर्थन करती है. यह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर साक्षरता का समर्थन करने एवं किताबों से बच्चों के सार्थक जुड़ाव के जरिये सीखने में मदद करने के लिए लाइब्रेरीज को नया रूप देने का काम करती है. बच्चों के बीच पढ़ने और सीखने के प्रति जीवनभर की रूचि जागृत करने के उद्देश्य से ‘पराग’ क्षमता निर्माण पाठ्यक्रम तथा मॉड्यूल्स की पेशकश करती है जो कि लायब्रेरियंस शिक्षकों तथा लायब्रेरी एजुकेटर्स को लायब्रेरी की एक ऐसे इनोवेटिव और क्रिएटिव जगह के तौर पर कल्पना करने में सक्षम बनाते हैं जो सक्रीय तथा उन्मुक्त हों.

टाटा ट्रस्ट्स के बारे में:

इस वर्ष अपनी 125 वीं वर्षगांठ का जश्न मना रहा ‘टाटा ट्रस्ट्स ‘ भारत के सबसे पुराने गैर-साम्प्रदायिक परोपकारी संगठनों में से एक है, जो सामुदायिक विकास के कई क्षेत्रों में काम करता है. स्थापना के बाद से ही, टाटा ट्रस्ट्स ने परोपकार के पारम्परिक विचारों में बदलाव लाने में अग्रणी भूमिका निभाई है, ताकि जिन समुदायों को सेवा दी जा रही है उनके जीवन में प्रभावपूर्ण, स्थाई परिवर्तन किये जा सकें। अपनी योजनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर लागू करते हुए, साझेदारीयुक्त रणनीतियों और अनुदान के जरिये इस ट्रस्ट्स ने शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण, ग्रामीण आजीविका, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के क्षेत्रों में इनोवेशन के साथ काम करते हुए समर्थन दिया और नागरिक समाज तथा प्रशासन एवं मीडिया, कला, शिल्प और संस्कृति को बढ़ाने का काम किया है. टाटा ट्रस्ट्स, निरंतर इसके संस्थापक जमशेतजी टाटा के सिद्धांतों के मार्गदर्शन में कदम बढ़ा रहा है और उनके सक्रिय परोपकार की दृष्टि के द्वारा, यह ट्रस्ट्स सामाजिक विकास में उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाहन कर रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि तमाम पहल और हस्तक्षेपों का राष्ट्रहित से सीधा संबंध है.

अधिक जानकारी के लिए कृपया विजिट करें: http://tatatrusts.org/

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Learn to cater to children’s library needs

Originally posted in DNA: http://www.dnaindia.com/education/report-learn-to-cater-to-children-s-library-needs-2544839 

To promote reading for pleasure through use of children’s literature, Parag initiative of Tata Trusts has come up with first-of-its-kind professional development certificate course

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After conducting a study of 15-20 non-profit organisations working on setting up or initiating libraries for children in rural areas, pan India in 2012, Parag initiative tried understanding key challenges that are faced in scaling quality programme.

The organisation figured one of the key gaps was to provide systematic training to facilitators.

They also noted that library science courses in the country do not educate librarians on special requirements of setting up libraries for children. “Library science departments do not offer any course for children’s librarians and hence the field has remained underdeveloped,” says Swaha Sahoo, Head-Parag Initiative at Tata Trusts.

In 2013-14, team Parag designed their first pilot course for the librarians in Hindi.

On realising that short term workshops and training were inadequate to bring about lasting changes, they came up with an idea of the Library Educator’s Course (LCE), a seven-months course for professionals. “LCE is open to all educators. It’s intended for librarians, development sector professionals, literacy educators and language experts,” affirms Sahoo.

The course has been designed to help practitioners to perceive library as an open creative space for all curricular areas, especially reading for pleasure.

Role of a library educator…

Most government run primary schools don’t have a librarian’s post. However, Right to Education Act (2009) mandates that every elementary school should have a library. Librarians aren’t mere book keepers. They work closely with children and books, continues Sahoo, they should be called as library educators.

Although, it’s a shared responsibility of the teacher, librarian, and parent to introduce children to books and reading, a library educator can be the central pivot to start children’s lifelong friendship with books. A well-trained library educator understands the world of books and can encourage children to read and explore multiple genres, especially the children that come from non-literate homes. “We should definitely keep boards and exams out of the library or the library educator’s role,” says Sahoo, who was an education beat journalist for more than a decade before associating with Parag.

The course…

Offered in Hindi and English, the course is conducted in dual mode – contact sessions and distance mode. The Hindi course is offered directly by Parag whereas the English course is done in partnership with Bookworm, Goa.

The Hindi course starts in May whereas English in April. It has three contact periods totaling 12 days along with distance mode including course readings, assignments, field projects etc.

There are no tests. The students have to do four assignments which they have to submit over the course period and a field project at the end of the year, based on which they will be graded. They are also graded as per the class participation.

While some papers and sessions are planned differently every year, the vision and the focus of the course remains the same. “In the current LEC (Hindi) batch we have participants who have joined on recommendations by their colleagues, who happen to be our ex-students,” affirms Sahoo. LEC’s long term aim is to develop children’s libraries as a separate discipline and to establish the role of trained library educators as crucial to children’s growth and development.

For Hindi: Five days in May, four days in August, and the last one is in November for three days.

For English: Five days in April, four days in July and the last one is in October for three days.

The course has no upper age limit.

Each class consists of 30 students.

No fixed timings.

Fees (highly subsidized): 25,000/- for Hindi, 30,000/- for English. It can be paid in installments.

Talk to ponder

We just winded up the second contact classes of the 3rd batch of Library Educator’s Course and one thing that stayed with me this time was the ‘need to talk’ about literature. As we tried to look at literature with different lenses and understand reader response we stumbled with the fact that perhaps except a few, the opportunity and space to talk about literature seems like a rare occasion or perhaps missing from our lives. A talk from the heart, devoid of any fear of being judged or free of the motive to arrive at the ‘right’ response. LEC brings a range of literature to participants and when it’s time to read or engage with a book in a session, for a participant the outcome in focus overtakes any one-to-one with the text… But often when we pause and ponder during this process or hear out others, what unfolds is a rich personal sharing which fills small group conversations. And it doesn’t always emerge on its own, but is sometimes created and nurtured.

When struck with an abundance of literature in these four to six days of our coming together, time falls short for emotions to unfold and an open sharing. Words fail our articulation. In the daily bustle of life we perhaps forget or overlook our need to talk about what we read. And ordinary schooling doesn’t tell us in any way that we need to talk. As educators we too rush to transfer our understanding to children/teachers and the trap of one right interpretation spreads.

During LEC I realized, everyone had so much within them, so beautifully tied with a memory, an experience, a feeling but it takes a lot for it to emerge.

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A participant expressed her need to talk about a poem on Gujarat riots by Anshu Malviya and the insane violence that is difficult to imagine, someone was drawn to the sadness that a son’s hanging brought to an old father in “Samudr tat par’ by O.V Vijayan, or the happiness that surrounded a dying street child in ‘Maachis bechne wali ladki’ by Hans Christian Andersen or the friendship of Mukand and Riaz amidst the backdrop of partition told so beautifully by Nina Sabnani, reminded a few of us of our own lost friends and the digital age which perhaps makes that loss ‘not so precious’. And there could be much more that is left unsaid and untold. More than anything we would learn or gain from such reading, what became important was our own thoughts about them. How they shaped, what they mean for another reader and for our larger presence and role in our current world. We all perhaps might have read something beautiful in our lives that stayed with us and might have just answered some ‘textbookish’ questions about it. But have we spoken what stirred our heart or what kept bringing that book back on our reading list or kept it away or connected us to something or drowned us in ideas or….the list is endless.

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A participant from a tribal background expressed how people he met always told him ‘to read’ and here in the Library course, friends ask ‘have you read this book?’ and there begins a conversation. This is not a matter of just reading but the identity that is associated with a reader. Perhaps libraries were meant to be such spaces. And against the common belief it is not just a space for the reader but also the non-reader because both are not passive beings of this world and are reading the world continuously.

In my own childhood and while growing up, the experience of a library was that of a ‘Silent’ room where you are with your ‘self’ and the book and your thoughts. What’s the value of sharing? Can any dialogue bring me more than the book tells me and is it important to make? To me personally, ‘talking’ only brings more and I go back to the book and re-think. I re-think about how my mind worked on this and how the other reader interpreted the same thing, what the author is saying to me and why, and why I believe or resent it or accept it with my own lens. As we move ahead with this course, the need to talk about literature or enable this for children’s libraries gets stronger in my head but only when we ourselves have opened our mind to it.

Ajaa is a Faculty with the Library Educator’s Course.

Experiences with future Library educators : Reflections on second contact

It was with great excitement that I participated in the second contact period of Library Educators Course (LEC) in offered by Bookworm in partnership with Parag Initiative of Tata Trusts.

In the morning, I was met by an empty hall at 11 am, and I was wondering how will the contact period unfold? I was not only excited but also a little nervous and then the Bookworm team came. They worked like a skilled and coordinated team. They arranged bookshelves, kept books, created reading spaces and a series of small activities and then the place started to look vibrant and inviting people to want to read. I could not even imagine that this whole space could be transformed in just one hour! It was this team’s skill and vision on library that could achieve this.

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First day of the contact session started with welcoming participants by making beautiful Rangoli together, to create a warm and creative environment for the contact session.

An important experience from this contact period was that a good discussion relies on so many small but important things like the sequence of sessions, the harmony among hearing, sharing and asking, which actually enable us to learn collectively. Usha’s session on Emily Ford’s paper was amazing, particularly the way she linked the session with books like That Bookwoman, Clara and the Book Wagon, Biblioburro, during the activity to understand “Praxis” in the Library. Jane’s session on illustration and becoming a reader was not only thought provoking but also enabled participant to consolidate their imagination about joy of reading. I realized that reading and library is itself a domain of knowledge. These sessions compel us to think about literature viz-a-viz Children’s library and reading.

The architects of the contact period were very sensitive toward listening capacity which was explored in a session woven around listening games by Alia. These games and exercises were refreshing and fun.

The specialized and technical sessions were beautifully supplemented by social aspect around reading and library. Megha took session on “Thematic teaching in the Library”. For this, she took an example of gender discrimination and enabled the participants to read and discuss on Thejasvi Shivanand’s paper. Through group discussion she showed that the main characters of children’s books are males, but she also emphasized that there are many such books that break this hegemony of male characters or their depictions. She linked the session with children’s books and enabled LEC participants to read and understand gender perspective in select books. It was my first experience to know library and reading through a gender perspective. It was a very interactive and reflective session. I must say that the collection of books of gender themes was carefully curated and supported the session in important ways.

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Though the main focus of session was gender, but for me it was amazing to know how bookmarking not only facilitates the reader but it also motivates readers to be pulled into a new theme. Through group work, importance of making bookmarks with some critical reflection was brought out.

Sujata had explained the vision and background of library at all time with a focus on the effect and experiences of library during the war. The discussion on war and linking the session with children’s books was a great way to enable the participants to understand the role of libraries in a larger socio- political sense. During the past few decades, historians have choosen variety of sources to interpret and reconstruct past, in this session we were able to understand past through selected children’s storybooks. She provided selected children’s story to participants. The selection of reading was impeccable, which was visible during the discussion of session. We felt a unique and untouched page of history that is about “library as a free space – a haven – our hope”.

There was another technical session by Sujata on Library assessment. This session got a new and constructive perspective on library evaluation. The session focused on a lot of practical aspect for smooth functioning of library, which included developing indicators and tools for assessment.

The contact period was a good demonstration of how learning can happen with fun. The session on drama where participants were acting out Sujata and Usha and trying to answer the questions on Libraries in the way they do was wonderful and full of fun.

On a personal note I think there are a lot of things that one can learn from all the sessions.

Along with a variety of books there were a lot of things displayed, particularly the display on “rain” and “handmade books” was really nice and reflective. The idea of “paper drops” was special, where each participant wrote their name on the paper drop and hung it on a display – making the display not just beautiful but interactive.

It’s not just a playful phrase, but in fact, I want to say that visiting Bookworm library, as part of the exposure visit, not only supplemented the learning during the sessions, but it was a complete experience in itself.

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Nitu

Aug 2018

Nitu Singh works with Parag, an initiative of Tata Trusts as Assistant Manager. She is coordinating the Library Educator’s Certificate course.

पुस्तकगाडीतील एक दिवस

Written by Pramod Kamble

पुस्तकगाडी (फिरते ग्रंथालय) हा प्रकल्प आदिवासी विकास विभाग व क्वॉलीटी एज्यूकेशन सपोर्ट ट्रस्ट यांच्या सहकार्याने पालघर जिल्ह्यातील दहा आश्रम शाळांमध्ये राबवविला जातो. मुलांमध्ये वाचनाची आवड निर्माण करणे व वाचन संस्कृती रुजविणे हा या प्रकल्पाचा उद्देश आहे. या प्रकल्पाद्वारे मुलांना असंख्य गोष्टीची पुस्तके उपलब्ध करून देणे, उत्तम पद्धतीने वाचून दाखविणे, त्यावर आधारीत लेखन करण्यास प्रोत्साहन देणे, तसेच बालसिनेमे दाखविणे या सारखे उपक्रम घेतले जातात. 

शाळेच्या इमारतीत स्वतंत्र ग्रंथालयाच्या खोलीची व्यवस्था नसते. बहुतेक सगळ्याच आश्रम शाळेतील मुलांची रहाण्याची व्यवस्थाही शाळेतील वर्गातच असते. आजारी मुलं वर्गातच मागील बाजूस झोपलेली असतात. त्यांच्यासाठी स्वतंत्र व्यवस्था नसते. वर्गामध्येच मुलांच्या सामानाच्या पेट्या असतात. बऱ्याच वेळेस पेट्या तुटक्या असतात. त्यांना कुलूप लावण्याची सोय देखील नसते. मुलांना वह्या, पुस्तके, कपडे शाळेकडूनच मिळतात. अभ्यासक्रमाच्या पुस्तकांखेरीज अन्य पुस्तके त्यांना मिळत नाही आणि त्यामुळे आम्ही नेत असलेली गोष्टीची पुस्तके परत न देता मुले स्वत:जवळ ठेवून घेतील आणि त्यामुळे काही पुस्तकं गहाळ होतील हे आम्ही गृहीत धरून चाललो होतो.

 

सोमवारी साकूर कन्या आश्रमशाळेत पोहचता-पोहचता १२.३० झाले. मुख्याध्यापकांना भेटण्यासाठी कार्यालयात गेलो असता नेहमीप्रमाणे ते मिटींगसाठी जव्हारला गेल्याच कळलं. कार्यालयातील शिपायाजवळ सरांकरिता निरोप ठेवला आणि नियोजना प्रमाणे मी पाचवीच्या वर्गावर गेलो. हजेरी घेणं चालू केलं, अचानक माझं लक्ष दाराकडे गेलं. दोन मुली दारात उभ्या होत्या. मी त्यांना आत येऊन बसायला सांगितल्यावर लगेचच वर्गातील मुलींकडून उत्तर आलं की, “ते पाचवीच्या नाय सातवीच्या हाहेत.” मी त्यांना येण्याचं कारण विचारलं तर त्या काहीच बोलल्या नाहीत. मी जागेवरून उठलो व त्यांच्याजवळ जाऊन पुन्हा तोच प्रश्न विचारला. पुन्हा तेच, दोघी ढिम्म, काहीच उत्तर नाही. मी पुन्हा विचारलं “बरं वाटत नाही का?  झोपायचे आहे का? पेटीतून काही सामान काढायचे आहे का?” असं विचारलं अनं बोलता-बोलता त्या मुलीचे नाव चमसरा असल्याच मला आठवलं. पुन्हा मी बोललो “काय झालं चमसरा?” तसं ती धीर करून म्हणाली “सर आमचे वर्गावं ये”. ‘यांचे झालं की तुमच्या वर्गावर येतो’ असं आश्वासन देऊन दोघींना पाठवले. पाचवीच्या वर्गात काम करताना वेळ कसा गेला तेच कळलं नाही. घंटा वाजल्यावर जेवणाची सुटी झाल्याचं आणि दोन वाजल्याच लक्षात आलं. दुपारचं जेवण आटपून गाडीत पुस्तक वाचत बसलो होतो. या सगळ्या गडबडीत चमसरा प्रकरण विसरून गेलो होतो. घंटा वाजली, सुटी संपली, शाळा भरली. सुटी संपल्यावर मुली वर्ग झाडून साफ करतात त्यामुळे आणखी थोडावेळ हाताशी होताच म्हणून स्वस्थपणे पुस्तक वाचतं गाडीत बसून होतो. कानाशी आवाज आला “ सर आमच्याव ये” मी पुस्तकातून डोकं बाहेर काढून पाहीलं तर पुन्हा चमसरा. मी हसलो आणि बोललो “जा वर्ग झाडून साफ करा, मी येतोच.” चमसरा बोलली “सर झाडेल” (सर झाडला आहे)  थोड्या आश्चर्यानी मी म्हणालो “झाडला ? बरं ठीक आहे. व्हा पुढे, मी येतोच”.  मला गाडीतून पुस्तकं, लेसनप्लान, हजेरी रजिस्टर शोधायला थोडा वेळ गेला, तोपर्यंत त्या जवळच घुटमळत होत्या. सगळं सामान घेऊन मी वर्गाच्या दिशेने चालू लागलो. त्या मा‍झ्यासोबतच चालत होत्या.

सातवीच्या वर्गात पोहचलो, हजेरी झाली. मागील वेळेस अर्धे वाचलेलं पुस्तक वाचून पूर्ण केलं. पुस्तकातील विषयाला धरून झाडे नष्ट झाली तर काय होईल या विषयावर चर्चा चालू केली पण मुलींचा फारसा सहभाग दिसत नव्हता, त्यांची कसली तरी चुळबुळ चालू होती. न राहून चर्चा बंद करीत मी विचारलं “काय झालं.” एक मुलगी बोलली “सर पुस्तका.” “पुस्तकांच काय?” मी विचारलं. “भासलेली पुस्तका” (हरवलेली पुस्तकं) हातात ८-१० पुस्तक घेऊन उभी राहत चमसरा बोलली. मी पुढे जाऊन पुस्तक हातात घेत विचारलं, “सापडली तर पुस्तकं ”. आठवड्या भराच्या गडबडीत विसरून गेलेलं मागच्या सोमवारचं पुस्तक प्रकरण मला आठवलं.

  दयानंद सोबत पुस्तकांचे ऑडीट करायला आलो होतो त्या वेळेस लक्षात आलं की सातवीच्या वर्गातून १२ पुस्तकं परत आली नाहीत. मी थोडासा चिडूनच वर्गात गेलो आणि ज्या मुलींनी पुस्तक परत दिली नहीत त्यांना उभं केलं. पुस्तकं न परतवण्याचं कारण विचारलं. सगळ्यांकडून एकच उत्तर “भासलं” (हरवलं). हरवलेल्या पुस्तकाची किंमत अथवा दंड घेणं हा पर्याय माझ्याजवळ उपलब्ध नव्हता. मुलींना घडलेल्या घटनेचे गांभिर्य लक्षात आणून देणे गरजेच होतं. मुलीं जवळील सगळी पुस्तकं जमा केली व त्यांना सांगीतलं हरवलेली पुस्तकं मिळाली नाहीत तर त्यांची किंमत मला भरावी लागेल. माझे नुकसान होत असेल तर यापुढे कोणालाच पुस्तक वाचायला देणार नाही आणि तुमच्या वर्गावर देखील येणार नाही असे त्यांना सहजच सांगीतले.

गेल्या वर्षभरात दहा ते बारा वेळा पुस्तक देवघेव प्रक्रिया सर्व शाळांतील मुलांसोबत झाली होती. कार्यक्रमाच्या सुरवातीच्या दोन महिन्यांत पाचवी, सहावी आणि सातवी इयत्तेच्या वर्गातील मुलांना प्रत्येक भेटी दरम्यान एका तासिके पुरती पुस्तकं वाचायला देऊन परत घेतली जात. हळूहळू मुलांना पुस्तकांची आवड निर्माण झाली व ती पुस्तकं ठेवायला मागू लागली. मुलांना पुस्तक देण्यापूर्वी त्यांची काळजी कशी घ्यावी, कशा पद्धतीने हाताळावे यासारख्या सूचना वारंवार दिल्या गेल्या. पुस्तकं तुमच्यासाठीच आहेत, जपून वापरली तरचं ती मागे शिकत असलेल्या तुमच्या बहीण-भावंडांना वाचायला मिळतील याचीही जाणीव करूण देण्यात आली. मुलांकडून पुस्तकं नीट वापरली जातील असे आश्वासन मिळाल्यानंतरच मुलांना पुस्तकं ठेवायला देण्यात येऊ लागली.

क्वचित आश्रमी मुलांकडील एखाद दुसरे पुस्तक हरवल्याचं किंवा पेटीचे कुलूप तोडून चोरी झाल्याच्या घटना घडत. पण मुळ समस्या दुसरीच आहे असं नंतर आमच्या लक्षात आलं. आश्रमशाळेत एका वर्गात ८० ते १०० मुलं असतात. उपलब्ध जागेची व्यवस्था पहाता सगळ्याच मुलांची शाळेत रहाण्याची सोय करता येत नाही. जवळच्या गावतील, पाड्यातील मुलं अशा परिस्थितीत घरून ये-जा करतात. या मुलांना डे-स्कॉलर म्हणतात. डे-स्कॉलर मुलांना घरी न्यायला दिलेली पुस्तक हरवल्यामुळे किंवा फाटल्यामुळे परत मिळत नाहीत. अशा मुलांकडून हरवलेल्या पुस्तकांची संख्या मोठी होती असे पुस्तक देवघेव रजीस्टर तपासल्या नंतर कळाले.

आता मा‍झ्या लक्षात आलं की चमसरा मी आल्या पासून सारखी का माझ्या मागे लागली होती ते. हाततील पुस्तकं मोजली. ती १० होती. पुस्तक देवघेव रजिस्टर मध्ये ती मिळाल्याची नोंद केली पण अजूनही २ पुस्तके परत आली नव्हती. त्याबद्दल मुलींशी बोललो तर त्या म्हणाल्या, ”भासेल पुस्तकाचं पैसं आमी देव, पन वर्गावं इजोस हो” (हरवलेल्या पुस्तकांचे पैसे आम्ही देतो. पण आमच्या वर्गात या.) मी होकार दिला आणि बाहेर निघालो.

आश्रमशाळेतील पुस्तेक नेहमी कपाटात ठेवली जातात आणि त्या मागे एक उत्तर ऐकायला मिळते  ते म्हणजे मुले पुस्तके फाडतात. म्हणजे अप्रत्यपणे मुलांना पुस्तकांची किंमत कळत नाही असं खरं तर त्यांच म्हणणं असतं. पण या निमित्ताने का होईना वरिल म्हणण्याला काही पाठींबा मिळत नाही. उलट पुस्तकांची आवड मुलांमध्ये निर्माण झाली तर ती पुस्तकांची काळजीही घेतात. त्यांना त्यांच्या जबाबदारीची जाणिव असते हेच या प्रसंगातून दिसून येते.   

 

                                                                 प्रमोद कांबळे

Pramod Kamble works with Quality Education Support Trust (QUEST), Maharashtra and is a participant in the Library Educators’ Course (Hindi batch), 2017.

Library Educators Course Hindi 2017 Glimpses

Book talk by Participant (2)

Book talk by Participant

Book talk by Participant

Book talk by Participant

Display.

Display

Dumb Charadge

Dumb Charade

Group discussion.

Group discussion

Group Discussion

Group Discussion

Group Reading (2)

Group Reading

Group Reading

Group Reading

Library

Library

Library display

Library display

Pitara Visit..

Pitara Visit

Pitara Visit

Pitara Visit

Poetry Evening - Anware Islam reading poem

Poetry Evening – Anware Islam reading poem

Poetry Evening..

Poetry Evening

Read Aloud on Biblioburro

Read Aloud on Biblioburro

Reading Article

Reading Article

Showing book mark made by participants

Showing bookmark made by participants

Shushil Shukla Session on Children literature

Shushil Shukla Session on Children literature

Singing poem in group

Singing poem in group

Gurbachan Ji speech on last day of contact

Gurbachan Ji’s speech on last day of contact

Mentor participants interaction (2)

Mentor participants interaction

Mentor Participants interaction

Mentor Participants interaction

Poetry Evening- Rajesh Joshi reading Poem

Poetry Evening- Rajesh Joshi reading Poem

Poetry Evening

Poetry Evening

Session by Tultul Biswas on Notion of Child

Session by Tultul Biswas on Notion of Child

LEC hindi Group Photo (2)

LEC Hindi group photo

Glimpse

 

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Game & reading time

Playing dumb charadge.

Playing dumb charade

Playing Game..

Playing Game

Playing Game (2)

Playing Game

Playing Game

Playing Game

Reading Time 2

Reading Time

Reading Time

Reading Time